Aravalli: 5 करोड़ लोग, 20 अभ्यारण्य खतरे में, अगर Aravalli खत्म हो गई तो असल में क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने Aravalli पहाड़ों की परिभाषा बदल दी है। 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों को अब Aravalli नहीं माना जाएगा। नतीजतन, दीदार पहाड़ियों को तोड़कर खुदाई करने का लाइसेंस दे दिया गया है। इससे लोगों, जानवरों और सबसे बढ़कर क्लाइमेट को खतरा है। Aravalli भारत के सबसे पुराने पहाड़ों में से एक है। पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पर्वत श्रृंखला न केवल उत्तर भारत को थार रेगिस्तान से बचाती है, बल्कि क्लाइमेट बैलेंस, ग्राउंडवाटर कंजर्वेशन और बायोडायवर्सिटी, यानी जानवर और पेड़-पौधों की दुनिया के बीच बैलेंस बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती है।

सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले ने अरावली पहाड़ों पर बहस छेड़ दी है। कहा गया है कि केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही Aravalli माना जाएगा। नतीजतन, 90% से ज़्यादा पहाड़ खतरे में पड़ गए हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस पर डिटेल में बताया, लेकिन इससे Aravalli की समस्या हल नहीं हुई।

अगर Aravalli न होती तो क्या होता?

मॉनसून बिना रुके पूरब की ओर बहेगा, जिससे राजस्थान में बारिश कम हो जाएगी। दिल्ली में भी बारिश में 20% की कमी आएगी। थार रेगिस्तान पूरब की ओर फैलेगा। उत्तर भारत में सूखा पड़ेगा। अगर Aravalli पहाड़ पूरी तरह खत्म हो गए, तो उत्तर भारत का क्लाइमेट पूरी तरह बदल जाएगा।

गैर-कानूनी माइनिंग और शहरीकरण की वजह से अरावली इलाका खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में Aravalli इलाके की परिभाषा में बदलाव किया है। सिर्फ़ 100 मीटर से ज़्यादा ऊँचे पहाड़ों को ही बचाने की इजाज़त है। साइंटिस्ट्स ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो उत्तर भारत को 10 से 20 साल के अंदर क्लाइमेट संकट का सामना करना पड़ेगा।

Pic credit:- NDTV

Aravalli का फैलाव

Aravalli पहाड़ लगभग 670 km लंबे हैं। ये लगभग 2.5 अरब साल पुराने हैं। ये उत्तर भारत को थार रेगिस्तान से बचाते हैं। यह क्लाइमेट को कंट्रोल करता है और बारिश लाता है। अरावली पहाड़ 4 राज्यों के 29 ज़िलों में फैले हुए हैं। गुजरात का Aravalli ज़िला, राजस्थान में उदयपुर, राजसमंद, अलवर, जयपुर, हरियाणा में गुरुग्राम, फरीदाबाद, भिवानी, महेंद्रगढ़, रेउड़ी और दिल्ली इस लिस्ट में हैं Aravalli पहाड़ों के बिना, उत्तर भारत सूखे और धूल भरी आंधियों की चपेट में आ जाता। मिट्टी के कटाव को रोका नहीं जा सकता था। Aravalli के जंगल एटमॉस्फियर से कार्बन सोखते हैं। इससे क्लाइमेट चेंज से लड़ने में मदद मिलती है।

Aravalli के आसपास 50 मिलियन लोग रहते हैं

Aravalli पहाड़ों के आसपास लगभग 50 मिलियन लोग रहते हैं। यह आबादी राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली में फैली हुई है। इस इलाके की ग्रामीण और शहरी दोनों आबादी अरावली पहाड़ों पर निर्भर है। 2011 की जनगणना के अनुसार, गुजरात के Aravalli ज़िले में 1 मिलियन से ज़्यादा लोग रहते हैं, जिनमें से 12% शहरी निवासी हैं। इन लोगों को Aravalli पहाड़ों से मिलने वाली साफ़ हवा और पानी से फ़ायदा होता है। लेकिन इस इलाके में माइनिंग से उनकी सेहत को खतरा हो सकता है।

सेंट्रल Aravalli इलाके में छोटे और बड़े मैमल्स की 31 किस्में हैं। इनमें तेंदुए, भालू, पक्षी, सियार और नेवले शामिल हैं। दिल्ली और हरियाणा में Aravalli में मैमल्स की 15 किस्में, पक्षियों की 300 से ज़्यादा किस्में और कई रेप्टाइल्स पाए जाते हैं। यहां कोलियोप्टेरा बीटल की 47 किस्में भी हैं। अगर पहाड़ियों की कटाई जारी रही, तो ये जानवर खत्म हो सकते हैं या शहरों और गांवों में चले जाएंगे।

Aravalli एक सूखा और पतझड़ वाला जंगल है। यह बबूल और नीम जैसी किस्मों का घर है। यहां पेड़ों की 200 से ज़्यादा किस्में हैं। दवा वाले पौधे भी लिस्ट में हैं।

रोज़गार और आर्थिक फ़ायदे

Aravalli इलाके के माइनिंग, टूरिज़्म और जंगल के रिसोर्स रोज़गार के मौके देते हैं। फरीदाबाद की 38.8% आबादी पहले माइनिंग में शामिल थी। ये अब गैर-कानूनी माइनिंग ऑपरेशन हैं। टूरिज्म से लाखों लोगों को नौकरी के मौके मिलते हैं। माइनिंग और टूरिज्म से होने वाली कुल इनकम हज़ारों करोड़ रुपये की है।

नेशनल पार्क और सैंक्चुअरी

Aravalli रेंज में सरिस्का टाइगर रिज़र्व, असोला भट्टी वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी, रणथंभौर नेशनल पार्क, कैला देवी सैंक्चुअरी और फुलवारी की नाल समेत कई जंगल हैं। कुल मिलाकर 20 से ज़्यादा सैंक्चुअरी हैं।

पहाड़ियों को काटने में क्या नुकसान है?

अगर 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियाँ काट दी जाती हैं, तो जानवरों का रहने का ठिकाना खत्म हो जाएगा। वे शहरी इलाकों में चले जाएँगे। इससे इंसानों के लिए खतरा बढ़ जाएगा।

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